Friday, April 4, 2008

बस में थी

बस में थी भीड़और धक्के ही धक्के,यात्री थे अनुभवी,और पक्के ।पर अपने बौड़म जी तोअंग्रेज़ी मेंसफ़र कर रहे थे,धक्कों में विचर रहे थे ।भीड़ कभी आगे ठेले,कभी पीछे धकेले ।इस रेलमपेलऔर ठेलमठेल में,आगे आ गएधकापेल में ।और जैसे ही स्टाप परउतरने लगेकण्डक्टर बोला-ओ मेरे सगे !टिकिट तो ले जा !बौड़म जी बोले-चाट मत भेजा !मैं बिना टिकिट केभला हूँ, सारे रास्ते तोपैदल ही चला हूँ ।

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